Last updated: August 30, 2026
Quick Answer: भुवनेश्वरी साधना, दशमहाविद्याओं में से एक देवी भुवनेश्वरी की उपासना है, जो ब्रह्मांड के आकाश तत्व और आंतरिक चेतना के विस्तार का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस साधना का मूल उद्देश्य मन के भीतर के असीमित “आकाश” या मानसिक स्थान को समझना और उसमें मौजूद विचारों तथा अनुभवों को बिना किसी लगाव के देखना है, जिससे साधक आध्यात्मिक उन्नति और मानसिक शांति प्राप्त कर सके। यह बाहरी ब्रह्मांड के समान ही आंतरिक चेतना में व्याप्त विशालता की खोज है।
Key Takeaways:
- भुवनेश्वरी देवी दशमहाविद्याओं में चौथी महाविद्या हैं और वे ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री, आकाश तत्व की प्रतीक हैं।
- उनकी साधना का अर्थ केवल भौतिक लाभ नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना के विस्तार और मन के भीतर के ‘आकाश’ को साधना है।
- ‘आकाश तत्व’ केवल भौतिक खाली स्थान नहीं, बल्कि विस्तार, धारण करने की क्षमता और सभी अनुभवों के आधार का प्रतीक है।
- भुवनेश्वरी साधना विचारों को रोकने के बजाय उन्हें बिना चिपके देखने की क्षमता विकसित करने में मदद करती है।
- मन के भीतर का आकाश विचारों, भावनाओं और स्मृतियों के लिए एक व्यापक, मौन पृष्ठभूमि प्रदान करता है।
- साधना में ध्यान, भुवनेश्वरी मंत्र का जाप और देवी के विशाल स्वरूप का चिंतन शामिल है।
- यह साधना बाहरी ब्रह्मांड और आंतरिक मन के बीच प्रतीकात्मक संबंध को उजागर करती है।
- साधना का लक्ष्य मन को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि उसमें मौजूद असीम जागरूकता को पहचानना है।
- समस्त नाम और रूप एक व्यापक चेतनात्मक आधार में प्रकट होते हैं, जिसका प्रतीक भुवनेश्वरी हैं।
- इस साधना से आंतरिक शांति, स्पष्टता और व्यक्तिगत सीमाओं से परे जाकर जागरूकता का अनुभव होता है।
भुवनेश्वरी देवी कौन हैं और दशमहाविद्या में उनका स्थान क्या है?
भुवनेश्वरी देवी दशमहाविद्याओं में से चौथी महाविद्या हैं और उन्हें ‘भुवनों की ईश्वरी’ या ‘समस्त ब्रह्मांड की स्वामिनी’ के रूप में जाना जाता है। वे ब्रह्मांड के आकाश तत्व का प्रत्यक्ष स्वरूप हैं, वह आदि शक्ति जो समस्त सृष्टि को धारण करती है और जिसमें सभी नाम तथा रूप प्रकट होते हैं [10]। भुवनेश्वरी को ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री शक्ति और सृजन की आधारभूत चेतना माना जाता है, जो असीमित विस्तार और धारण करने की क्षमता का प्रतीक हैं।
भुवनेश्वरी का नाम दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है: “भुवन” जिसका अर्थ है ब्रह्मांड या लोक, और “ईश्वरी” जिसका अर्थ है स्वामिनी या शासक। इस प्रकार, वे ‘समस्त ब्रह्मांड की स्वामिनी’ हैं [10]। दशमहाविद्याओं में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे सृष्टि के अस्तित्व के लिए आवश्यक ‘स्थान’ (space) का प्रतिनिधित्व करती हैं। वे केवल किसी भौतिक स्थान की देवी नहीं हैं, बल्कि उस मूलभूत चेतनात्मक आकाश (Akasha) का प्रतीक हैं जिसमें विचार, भावनाएं और समस्त ब्रह्मांडीय लीलाएं उत्पन्न होती हैं [1]। उनका विशाल और सर्वव्यापी स्वरूप यह दर्शाता है कि वे सीमाओं से परे, हर दिशा में व्याप्त हैं और समस्त ब्रह्मांड को अपनी चेतना में समाहित करती हैं।
भुवनेश्वरी साधना करने से पहले क्या तैयारी करनी चाहिए?
भुवनेश्वरी साधना करने से पहले कुछ महत्वपूर्ण तैयारियां आवश्यक हैं ताकि साधक एकाग्रता और आंतरिक शुद्धि के साथ साधना में प्रवेश कर सके। इसमें शारीरिक, मानसिक और परिवेशगत शुद्धता शामिल है, जो साधना के लिए अनुकूल वातावरण का निर्माण करती है।
साधना से पूर्व, साधक को शारीरिक शुद्धि के लिए स्नान करना चाहिए और स्वच्छ, अधिमानतः लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए [12]। साधना के लिए एक शांत और पवित्र स्थान का चुनाव करें जहाँ कोई व्यवधान न हो। यह स्थान बाहरी तौर पर अव्यवस्था मुक्त हो, जिससे मन को शांत करने में मदद मिले। मानसिक रूप से, साधक को सभी चिंताओं और इच्छाओं को एक तरफ रखकर केवल साधना पर ध्यान केंद्रित करने का प्रयास करना चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4-6 बजे) को साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है [9]। एक गुरु से दीक्षा और मार्गदर्शन प्राप्त करना विशेष रूप से शुरुआती साधकों के लिए अत्यंत लाभकारी होता है, क्योंकि वे साधना के सूक्ष्म पहलुओं और संभावित बाधाओं पर प्रकाश डाल सकते हैं।

भुवनेश्वरी मंत्र का सही उच्चारण और जाप विधि क्या है?
भुवनेश्वरी मंत्र का सही उच्चारण और जाप विधि साधना में सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह देवी की ऊर्जा से जुड़ने का सीधा माध्यम है। यह मंत्र आकाश तत्व के कंपन से जुड़ा है और साधक के आंतरिक आकाश को जागृत करने में सहायक होता है।
देवी भुवनेश्वरी का मूल मंत्र “ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः” है [12]। इस मंत्र का जाप करते समय प्रत्येक अक्षर को स्पष्ट रूप से और सही ताल के साथ उच्चारित करना चाहिए। ‘ह्रीं’ बीज मंत्र देवी का शक्ति बीज है, जिसे ध्यानपूर्वक उच्चारित करने से विशेष ऊर्जा का संचार होता है। जाप के लिए रुद्राक्ष या कमलगट्टे की माला का प्रयोग किया जा सकता है। प्रतिदिन कम से कम 108 बार मंत्र जाप करना चाहिए, हालाँकि, इसे 11, 21 या 41 दिनों के लिए नियमित रूप से जारी रखने से गहन अनुभव प्राप्त होते हैं [9]। जाप के दौरान मन को शांत रखने और देवी के विशाल, सर्वव्यापी स्वरूप का चिंतन करने का प्रयास करें।
आकाश तत्व की साधना भुवनेश्वरी साधना से कैसे जुड़ी है?
आकाश तत्व की साधना भुवनेश्वरी साधना का केंद्रीय और दार्शनिक आधार है, क्योंकि भुवनेश्वरी स्वयं आकाश, विस्तार और ब्रह्मांडीय चेतना का प्रतीक हैं। भारतीय दर्शन में आकाश केवल भौतिक खाली स्थान नहीं है, बल्कि वह सूक्ष्म तत्व है जो सभी वस्तुओं और अनुभवों को धारण करता है और उन्हें प्रकट होने के लिए स्थान प्रदान करता है [3]।
जिस प्रकार समस्त ब्रह्मांड आकाश में विद्यमान है, उसी प्रकार हमारे मन के भीतर भी एक आंतरिक ‘आकाश’ होता है जिसमें विचार, भावनाएं और अनुभूतियां उत्पन्न और विलीन होती हैं। भुवनेश्वरी साधना इस आंतरिक आकाश को समझने और उसमें चेतना के विस्तार का अभ्यास है [1]। साधक देवी के माध्यम से इस व्यापकता को अपने भीतर अनुभव करता है। यह साधना हमें सिखाती है कि हम अपने विचारों और भावनाओं से स्वयं को अलग करके, उनके पीछे मौजूद असीम ‘स्थान’ या जागरूकता को पहचानें। यह आकाश तत्व का ध्यान हमें अपनी सीमाओं से परे जाकर ब्रह्मांडीय चेतना के साथ एकाकार होने में मदद करता है [5]।
भुवनेश्वरी साधना के फायदे और लाभ क्या हैं?
भुवनेश्वरी साधना के लाभ केवल भौतिक इच्छाओं की पूर्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह गहरे आध्यात्मिक और मानसिक परिवर्तन लाती है। यह साधना साधक को आंतरिक शांति, स्पष्टता और व्यक्तिगत विकास की दिशा में अग्रसर करती है।
इस साधना से साधक को अपने भीतर एक विशाल और शांत आंतरिक स्थान का अनुभव होता है, जिससे मानसिक तनाव और चिंताएँ कम होती हैं [1]। यह विचारों और भावनाओं को बिना उनसे चिपके देखने की क्षमता विकसित करती है, जिससे मन में अनासक्ति भाव आता है। निरंतर साधना से साधक की चेतना का विस्तार होता है, जिससे वह स्वयं को ब्रह्मांड के एक बड़े हिस्से के रूप में अनुभव करता है। यह निर्णय लेने की क्षमता में सुधार, वाणी में मिठास, और जीवन के विभिन्न पहलुओं में विस्तार ला सकती है [12]। इसके अतिरिक्त, यह साधना आंतरिक बाधाओं को दूर करने और आत्मज्ञान की प्राप्ति में सहायक होती है, जिससे साधक जीवन में अधिक सम्मान, नेतृत्व क्षमता और आध्यात्मिक सफलता प्राप्त कर सकता है [12]।
मन के भीतर का आकाश क्या होता है और इसे कैसे महसूस करते हैं?
मन के भीतर का आकाश एक प्रतीकात्मक अवधारणा है जो हमारी आंतरिक चेतना के उस असीमित, व्यापक स्थान को संदर्भित करती है जहाँ विचार, भावनाएं, स्मृतियां और अनुभव प्रकट होते और विलीन होते हैं। यह हमारी मानसिक दुनिया का वह मौन आधार है जो सभी मानसिक गतिविधियों को धारण करता है।
इसे ऐसे समझा जा सकता है: जैसे बाहरी ब्रह्मांड में तारे, ग्रह और आकाशगंगाएँ एक विशाल खाली स्थान में विचरण करती हैं, उसी प्रकार हमारे मन में भी विचार, कल्पनाएँ और भावनाएँ एक आंतरिक ‘खालीपन’ या ‘स्थान’ में गति करती हैं। यह खाली स्थान निष्क्रिय नहीं है, बल्कि जागरूकता से भरा हुआ है [5]। मन के भीतर के आकाश को महसूस करने के लिए, हमें अपने विचारों और भावनाओं से खुद को थोड़ा अलग करके उन्हें एक तटस्थ दर्शक के रूप में देखना सीखना होगा। जब आप आंखें बंद करके शांत बैठते हैं और अपने विचारों को बस आने-जाने देते हैं, बिना उन पर प्रतिक्रिया दिए, तो विचारों के बीच जो अंतराल या मौन का अनुभव होता है, वही मन के भीतर का आकाश है। यह एक ऐसी अवस्था है जहाँ आप अपने विचारों से बंधे नहीं होते, बल्कि उनके पीछे मौजूद असीम जागरूकता को पहचानते हैं।

बाहरी ब्रह्मांड बनाम आंतरिक मन: एक प्रतीकात्मक तुलना
| बाहरी जगत | आंतरिक जगत |
|---|---|
| आकाश (Space) | मानसिक आकाश |
| ग्रह और तारे | विचार और अनुभव |
| गति | विचारों का प्रवाह |
| खाली स्थान | मौन और जागरूकता |
| ब्रह्मांड | आंतरिक संसार |
भुवनेश्वरी साधना करते समय कौन सी गलतियां नहीं करनी चाहिए?
भुवनेश्वरी साधना करते समय कुछ सामान्य गलतियों से बचना आवश्यक है, ताकि साधना में बाधा न आए और उसके पूर्ण लाभ प्राप्त हो सकें। इन गलतियों से साधना की प्रभावशीलता कम हो सकती है या अनचाहे परिणाम भी आ सकते हैं।
सबसे पहले, साधना को केवल भौतिक लाभों, जैसे धन या सफलता, की प्राप्ति तक सीमित न रखें। भुवनेश्वरी देवी का महत्व आंतरिक विस्तार और चेतना की जागृति में है, न कि केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति में [1]। दूसरा, साधना में निरंतरता का अभाव एक बड़ी गलती है; नियमित अभ्यास अत्यंत महत्वपूर्ण है, भले ही शुरुआत में थोड़े समय के लिए ही क्यों न हो [11]। तीसरा, मंत्र का गलत उच्चारण या ध्यान का अभाव भी साधना को निष्प्रभावी बना सकता है। इसके अलावा, साधना के दौरान क्रोध, ईर्ष्या, असत्य वचन या कामुक विचारों से बचना चाहिए [12]। एक गुरु के मार्गदर्शन के बिना गहन साधना में प्रवेश करना भी एक गलती हो सकती है, क्योंकि वे सही दिशा और आवश्यक सावधानियां बता सकते हैं।
भुवनेश्वरी पूजन के लिए सही समय और दिशा क्या है?
भुवनेश्वरी पूजन और साधना के लिए सही समय और दिशा का चुनाव अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं के साथ साधक के तालमेल को बढ़ाता है और साधना की सफलता में सहायक होता है।
भुवनेश्वरी पूजन के लिए ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग 1.5 घंटे पहले) को अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि इस समय मन शांत और वातावरण पवित्र होता है [9]। यदि ब्रह्म मुहूर्त संभव न हो, तो सूर्यास्त के बाद का समय भी उपयुक्त होता है। शुक्ल पक्ष (बढ़ते चंद्रमा का समय) में पुष्य या हस्त नक्षत्र के दौरान साधना प्रारंभ करना विशेष रूप से लाभकारी माना गया है [12]।
दिशा की बात करें तो, साधना करते समय अपना मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना चाहिए [12]। पूर्व दिशा सूर्योदय और नई शुरुआत का प्रतीक है, जबकि उत्तर दिशा धन और आध्यात्मिक ज्ञान से जुड़ी है। देवी की मूर्ति या चित्र स्थापित करते समय भी इसी दिशा का ध्यान रखना चाहिए।
क्या शुरुआती लोग भुवनेश्वरी साधना कर सकते हैं या गुरु की जरूरत है?
शुरुआती लोग सामान्य तौर पर भुवनेश्वरी साधना के सरल पहलुओं, जैसे मंत्र जाप और ध्यान, का अभ्यास कर सकते हैं। हालांकि, इस साधना के गहरे और अधिक जटिल तांत्रिक या दार्शनिक आयामों के लिए एक योग्य गुरु का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है।
बिना गुरु के, साधक को साधना के सूक्ष्म अनुभवों को समझने या संभावित बाधाओं को दूर करने में कठिनाई हो सकती है। गुरु न केवल सही विधि और मंत्र का उच्चारण सिखाते हैं, बल्कि वे साधक की ऊर्जा को संतुलित करने और उसकी प्रगति पर नज़र रखने में भी मदद करते हैं [12]। एक गुरु की उपस्थिति साधना को सुरक्षित और अधिक प्रभावी बनाती है, विशेषकर जब साधना आंतरिक आकाश के गहन अनुभवों में प्रवेश करती है। यदि तत्काल गुरु उपलब्ध न हों, तो शुरुआती साधक किसी प्रामाणिक ग्रंथ या प्रतिष्ठित आध्यात्मिक स्रोत से सरल भुवनेश्वरी मंत्रों और ध्यान तकनीकों का अभ्यास कर सकते हैं, साथ ही गुरु मिलने की कामना भी कर सकते हैं।
भुवनेश्वरी साधना में आने वाली बाधाओं को कैसे दूर करें?
भुवनेश्वरी साधना में आने वाली बाधाएँ अक्सर मानसिक होती हैं, जैसे एकाग्रता की कमी, विचारों का प्रवाह, या शारीरिक बेचैनी। इन बाधाओं को दूर करने के लिए धैर्य, निरंतर अभ्यास और सही तकनीकों का प्रयोग महत्वपूर्ण है।
इन बाधाओं को दूर करने के लिए सबसे पहले नियमितता बनाए रखना आवश्यक है। भले ही मन न लगे, फिर भी निर्धारित समय पर साधना अवश्य करें [11]। जब मन भटकने लगे, तो ध्यान को धीरे से अपनी श्वास या मंत्र पर वापस लाएँ, बिना खुद पर गुस्सा किए। प्रत्याहार (इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाना) का अभ्यास करें, जहाँ आप अपने विचारों और अनुभवों को एक तटस्थ दर्शक के रूप में देखते हैं, बिना उनसे चिपके। साधना से पहले और बाद में हल्के प्राणायाम का अभ्यास मन को शांत करने में मदद कर सकता है। यदि शारीरिक बेचैनी हो, तो अपनी मुद्रा में थोड़ा सुधार करें। किसी भी नकारात्मक भावना या संदेह को स्वीकार करें और उन्हें अपने भीतर के विशाल आकाश में विलीन होने दें। गुरु का मार्गदर्शन या अनुभवी साधकों के साथ चर्चा भी इन बाधाओं को समझने और दूर करने में सहायक हो सकती है।
भुवनेश्वरी और अन्य दशमहाविद्याओं की साधना में क्या अंतर है?
भुवनेश्वरी और अन्य दशमहाविद्याओं की साधनाओं में उनके मूल स्वरूप और दार्शनिक सिद्धांतों के कारण महत्वपूर्ण अंतर हैं, हालांकि सभी महाविद्याएं आदि शक्ति के ही विभिन्न रूप हैं। यह अंतर उनकी प्राथमिक ऊर्जा और जिस तत्व का वे प्रतिनिधित्व करती हैं, उस पर आधारित है।
| महाविद्या | प्रमुख गुण | प्रतिनिधित्व | साधना का फोकस |
|---|---|---|---|
| भुवनेश्वरी | आकाश, विस्तार, सृष्टि, धारण करने की क्षमता | ब्रह्मांडीय स्थान, चेतना का आधार [3] | आंतरिक और बाहरी आकाश का अनुभव, विचारों को धारण करना |
| काली | काल, परिवर्तन, विनाश, अहं-विघटन | समय की शक्ति, परिवर्तनकारी ऊर्जा [3] | अहंकार का शमन, मुक्ति, भय पर विजय |
| तारा | तारण शक्ति, मार्गदर्शन, नाद | संकट से उबारने वाली, आध्यात्मिक ज्ञान [3] | वाणी सिद्धि, ज्ञान प्राप्ति, कठिनाइयों से मुक्ति |
भुवनेश्वरी विशेष रूप से ‘स्थान’ या ‘आकाश’ की देवी हैं, जो हमें अपने भीतर और बाहर के असीमित विस्तार को समझने में मदद करती हैं [6]। उनकी साधना का लक्ष्य चेतना का विस्तार और मन में व्यापकता लाना है। इसके विपरीत, काली काल और परिवर्तन की उग्र शक्ति हैं, जिनकी साधना का उद्देश्य अहंकार का नाश और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति पाना है। तारा देवी तारण शक्ति हैं, जो साधक को कठिनाइयों और अज्ञानता से पार ले जाती हैं।
भुवनेश्वरी साधना के दौरान ध्यान और एकाग्रता कैसे बढ़ाएं?
भुवनेश्वरी साधना के दौरान ध्यान और एकाग्रता बढ़ाना एक क्रमिक प्रक्रिया है जिसमें नियमित अभ्यास और कुछ विशेष तकनीकों का प्रयोग सहायक होता है। यह मन की चंचलता को कम करके आंतरिक शांति और स्पष्टता लाती है।
सबसे पहले, साधना के लिए एक निश्चित समय और स्थान निर्धारित करें ताकि मन उस दिनचर्या का आदी हो जाए [11]। शुरुआत में छोटे-छोटे अंतराल के लिए ध्यान करें, फिर धीरे-धीरे समय बढ़ाएं। मंत्र जाप के दौरान अपने मन को मंत्र की ध्वनि पर केंद्रित करें; यदि मन भटके, तो उसे धीरे से वापस लाएं। अपने श्वास पर ध्यान केंद्रित करना भी एकाग्रता बढ़ाने का एक प्रभावी तरीका है; श्वास के आने-जाने को observe करें। देवी भुवनेश्वरी के शांत और विशाल स्वरूप का मानसिक चिंतन करें, उनके असीम विस्तार को महसूस करें। https://jyotishdev.com/blogs/upvaas-sharir-mann-ki-shuddhi/ जैसे लेख भी मन की शुद्धि के लिए सहायक सिद्ध हो सकते हैं। विचारों को रोकने की कोशिश न करें, बल्कि उन्हें एक दर्शक के रूप में देखें, जैसे बादल आकाश में आते और चले जाते हैं। यह आपको विचारों से अनासक्त होने और उनके बीच मौजूद ‘आकाश’ को पहचानने में मदद करेगा [5]।

क्या महिलाएं और पुरुष दोनों भुवनेश्वरी साधना कर सकते हैं?
हाँ, महिलाएं और पुरुष दोनों भुवनेश्वरी साधना कर सकते हैं। तांत्रिक और शाक्त परंपराओं में, महाविद्याओं की साधना में लिंग-भेद नहीं होता है। आध्यात्मिक पथ पर बढ़ने की इच्छा रखने वाला कोई भी व्यक्ति, चाहे वह पुरुष हो या महिला, भुवनेश्वरी देवी की उपासना कर सकता है।
यह साधना व्यक्तिगत चेतना के विस्तार और आंतरिक विकास पर केंद्रित है, जो किसी भी लिंग के साधक के लिए समान रूप से उपलब्ध है। महत्वपूर्ण है श्रद्धा, नियम-पालन और गुरु का मार्गदर्शन, न कि साधक का लिंग। प्राचीन ग्रंथों और आधुनिक गुरुओं द्वारा भी इस बात की पुष्टि की गई है कि आध्यात्मिक साधनाएं सभी के लिए हैं जो गंभीरता और समर्पण के साथ अभ्यास करना चाहते हैं।
FAQ
भुवनेश्वरी मंत्र का जाप कितनी बार करना चाहिए?
भुवनेश्वरी मंत्र का जाप प्रतिदिन कम से कम 108 बार करना चाहिए, लेकिन गहन साधना के लिए इसे 11, 21 या 41 दिनों तक निरंतर जारी रखने की सलाह दी जाती है [9]।
भुवनेश्वरी साधना से क्या मन शांत होता है?
हाँ, भुवनेश्वरी साधना मन को शांत करने में सहायक है क्योंकि यह विचारों को रोकने के बजाय उन्हें बिना चिपके देखने की क्षमता विकसित करती है, जिससे आंतरिक शांति का अनुभव होता है [1]।
आकाश तत्व का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
आकाश तत्व का आध्यात्मिक अर्थ केवल भौतिक खाली स्थान नहीं, बल्कि वह सर्वव्यापी चेतनात्मक आधार है जो सभी वस्तुओं और अनुभवों को धारण करता है और उनके प्रकट होने के लिए ‘स्थान’ प्रदान करता है [3]।
क्या भुवनेश्वरी साधना से भौतिक लाभ मिलते हैं?
भुवनेश्वरी साधना मुख्य रूप से आंतरिक विस्तार और चेतना की जागृति के लिए है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता, सम्मान और स्थिरता जैसे भौतिक लाभ भी प्राप्त हो सकते हैं [12]।
भुवनेश्वरी देवी को ‘सृष्टि का गर्भ’ क्यों कहते हैं?
भुवनेश्वरी को ‘सृष्टि का गर्भ’ इसलिए कहते हैं क्योंकि वे उस मौलिक ‘स्थान’ या चेतनात्मक आधार का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसमें समस्त नाम और रूप (सृष्टि) प्रकट होते हैं और धारण किए जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे गर्भ में जीवन पलता है [1]।
क्या भुवनेश्वरी साधना किसी विशेष दिन पर करनी चाहिए?
भुवनेश्वरी साधना रविवार या बुधवार को शुरू करना शुभ माना जाता है, विशेष रूप से शुक्ल पक्ष में पुष्य या हस्त नक्षत्र के दौरान [12]। हालांकि, नियमितता सबसे महत्वपूर्ण है।
मन के भीतर के आकाश को साधने का क्या मतलब है?
मन के भीतर के आकाश को साधने का मतलब है अपने विचारों और भावनाओं के पीछे मौजूद असीम जागरूकता और मानसिक ‘स्थान’ को पहचानना, ताकि आप उनसे तुरंत जुड़ने या प्रतिक्रिया देने के बजाय उन्हें तटस्थ भाव से देख सकें [5]।
References
[1] Bhuvaneshwari The Cosmic Queen And Embodiment Of Divine Space – https://saketposwal.com/blog/bhuvaneshwari-the-cosmic-queen-and-embodiment-of-divine-space/
[3] Dasha Mahavidya Bhuvaneshwari – https://svatantra.institute/dasha-mahavidya-bhuvaneshwari/
[5] Watch – https://www.youtube.com/watch?v=nV-X2mkb8Ro
[6] Bhuvaneshwari – https://www.sivasakti.com/tantra/dasa-maha-vidya/bhuvaneshwari/
[9] Watch – https://www.youtube.com/watch?v=gbPqvhc4jY0&vl=it
[10] Bhuvaneshwari – https://adhyatmas.com/deities/bhuvaneshwari
[11] Maha Vidya Bhuvaneshwari Tantra – https://jyotishdev.com/blogs/mahavidya-bhuvaneshwari-tantra/
[12] Bhubaneswari Sadhana – https://shivgyana.com/bhubaneswari-sadhana-mantra-for-expansion-and-prosperity/
